विदेशी बैंको मे जमा धन के मुद्दे पर अभी तक हम सभी ने बहुत कुछ लिखा पढ़ा और सुना अब विदेश मे जमा काले धन की स्वदेश वापसी मुद्दे पर हमारी सरकार गंभीर नही दिखाई पड़ रही है। बहुत दिनो तक इस पर होहल्ला चला अब इस मुद्दे पर से सभी लोगों का ध्यान हट गया, या धीरे-धीरे देर सवेर हट जाएगा सबके-सब एकदम खामोश और अब शुरु हुआ, अपने ही देश मे बैठे अरुण मिश्रा जैसे UP SIDC केचीफ इंजीनियर स्तर के एक कर्मचारी ने अकूत धन बैंको के वेनामी खातों मे और अनेको अचल संपत्तियां इकट्ठा होने के मुद्दे ने जोर पकड़ लिया है। इसकी जानकारी अभी CBI द्वारा उनके घर से लेकर कार्यालय पर मारे गये छापे से यह मालूम हुआ कि मनी लाँण्ड्रिंग के मामले के रहस्य पर से पर्दा उठते-उठते एक अरब रुपए के घोटाले होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। बहुत मात्रा मे धन, चल-अचल संपत्तियां अरुण मिश्रा ही नही ऐसे अनेको भ्रष्टाचारियों के लाकरों से लेकर उनके कब्जे मे फँस कर सड़ रहे होंगे। इस तरह हमारी अर्थव्यवस्था का सफेद धन, काले धन मे बदल कर हमारे अर्थ व्यावस्थासे बाहर हो गया। जिसका प्रभाव परोक्ष-अपरोक्ष रुप से बाजार भाव से लेकर आर्थिक गती विधीयों मे पड़ना तय है। हमारे देश की गरीब जनता कठोर मेहनत करने के बावजूद और गरीब होता जा रहा है, धनी और धनी। इस पर भी हमारे देश की पार्टीयाँ और सरकार आर्थिक संपन्नता की बात करती है आर्थीक संपन्नता के मामले मे हमारे देश की गरीब जनता आर्थिक संपन्न भले ही न हुए हो भ्रष्टाचारी जनता जरुर आर्थिक संपन्न हो गये हैँ और हमारी सरकार कागजों मे ऐसे जनता की संपन्नता का आकड़ा दे कर हमारे देश की आर्थीक तरक्की की बात बड़े गर्व के अपने पार्टी की उपल्बधीयों का वखान समाचार पत्रो से लेकर दुर्दशन पर समय- समय करती रहती है। हमारे देश मे आर्थिक संपनता और समानता तभी आ सकती है जब पार्टीयां और सरकार वास्तव मे गरीब जनता के उत्थान और संपनता के लिए ईमानदारी से नही सोचेगी। यदि हमारे देश मे भ्रष्टाचार पर सर्वेक्षण कराया जाए तो देश की कुल आबादी के 25 से 30 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह के भ्रष्टाचार मे लिप्त पाये जाएगें। भले ही छोटा आदमी छोटा भ्रष्टाचार बड़ा आदमी बड़ा भ्रष्टाचार इन सभी भ्रष्टाचारीयों का काला धन वटोर कर देश के गरीब जनता मे समान रुप से बांट दिया जाना चाहिए। क्यों कि यह उन्ही लोगो का और हमारे देश की जनता का ही धन है और इस धन की कमी की बजह से न जाने कितने गरीबों को कफ़न तक से वंचित रहना पड़ा होगा।
किसी भी मनुष्य को अपने जीवन में सफलता पानेका एक सिद्धांत है। आप परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लें यापरिस्थितियों के अनुकूल स्वंम बन जाएं।सभी परिस्थितियों में एक जैसा रह कर विचलित न होना सफलता पाने की पहली शर्त है। न जाने हमारे जीवन में कब,कौन-सीसमस्या किस रुप में आ जाए। इसके लिए हमें हमेशा चौंकना और सजग प्रहरी की तरह रहना पड़ता है। जीवन में जिन का तरीके और जिनके मर्यादित रुप से जीवन निर्वाह करने एवं प्रबंधनका एक सूत्र यह है कि यदि आप समाधान का अंग नहीं हैं, तो फिर आप खुद एकसमस्या हैं।समाधानकारी चरित्र हमें जीवन तत्वों का सहीउपयोग करते हुए व्यक्तित्व विकास की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है।ऐसा न हो कि आज सफल हुए, लापरवाही केकारण या किसी अन्य बजह से भविष्य में सफलता आपके जीवन से फिसल जाए। जिस तरहताशकेखेलमेंजो अपने पत्तों को छुपानाजानताहैउसे ही एकअच्छाखिलाड़ीसमझाजाताहै। लेकिनजिन्दगीकेमामलेमें यह विपरीत है।छुपाना व्यक्तित्व का एक दोष है। इसके ठीक विपरीत खुलापन एवं उदारता शांतिकाप्रतीक है।यह व्यक्ति केव्यक्तित्वकीपारदर्शिताहै। वास्तव में एक मनुष्य का जीवन और व्यक्तित्व ऐसाहोना चाहिए जैसे किसी पुस्तकालय की मेज पर पड़ी हुई एक खुली किताब या समाचार पत्र जो चाहे जब भी पड़ ले।दुरुहता एवं छिपाव, से व्यक्ति के अन्दर की सहजता समाप्तहोजातीहै। अक्सर यह देखने में आता है किखुलेदिलो-दिमागकेलोगअपनी उन्नति में अपने से जुड़े लोगों को भी समान रुप से सम्मिलित करते हैं। अपने जीवन में खुलापन बनाये रखने से व्यक्ति के अन्दर सत्य का निर्माण होकर हिम्मत एवं साफ सुथरी चीज को पसंन्द करने जैसी व्यक्तित्व का निर्माण होता है। वर्तमान समय में यह देखने को मिल रहा है कि लोग अकारण ही छोटी से छोटी बात पर भी बहुत आसानी से झूठ बोलते रहते हैँ, ऐसे लोगों पर यह यकीन करना बहुत ही कठिन हो जाता है, कि उनके द्वारा कही बातों में से कौन सी सच और कौन झूठ। मेरे समझ से यदि मनुष्य अपने जीवन में झूठ के स्थान पर सच को आधार बना कर चले तो निश्चित रुप से मनुष्य का जीवन निर्भय और दुखः कलेश से मुक्त तो होगा ही साथ ही साथ हम अपने जीवन में निश्चित रुप से सफल भी होंगे।
देख तेरे इन्सान की हालत क्या हो गयी भगवान.........
दिनांक -14/02/11
आज हमारे देश में चारों तरफ आम आदमीखाद्य वस्तुओं की महंगाई से लेकर सभी वस्तुओं में 17 फीसदी का इजाफा और भ्रष्टाचार की वजह से सरकार में उसकी आस्था की जड़ों को हिला कर रख दिया है।आज देश के अधिक्तर लोगों के अन्दर यह बात पैठ गयी है किसरकार और नौकरशाह खूबपैसे बना रहे हैं,जबकि जनता को उसके एक-एक बुनियादी वस्तुओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।समाज के हर व्यक्ति के अन्दर एक मंद अग्नि सी सुलगती हुई दिखाइ दे रही है। लोग परिस्थियों से संघर्ष करते हुए, देखते हुए, सुनते हुए, झेलते हुए, समाज के प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में एक सुशुप्त ज्वालामूखी का निर्माण हो चुका है। प्रत्येक समाज की सहन शक्ति का एक निश्चित मापदंड है। हमारे समाज के कुछ लोग इस समय तो मौन हैं, कुछ एक लोग लगातार अपने शब्दों से, और कुछ लोग अपने लेखन द्वारा समय-समय पर इस पर कुठाराघात करते चले आ रहे हैं। कुल मिला कर समाज का प्रत्येक मनुष्य अपने घर से लेकर समाज तक में होने वाले परिर्वतनों, घटित घटनाओं से बहुत प्रभावित होकर क्या करे या न करे की स्थिती तक पहुँच गये हैं किसी भी समाज की यह स्थिति अत्यन्त विस्फोटक या खतरनाक होती है। अभी-अभी हमने मिश्र की जन आन्दोलन की विस्फोटक स्थिति को पढ़ा, सुना व देखा। ऐसी स्थिति अचानक पैदा नहीं होती है, बल्कि यह स्थिति अनेकों वर्षों के बाद समाज की सहनशीलता लांघ कर विस्फोटक स्थिति के उच्चतम शिखर पर पहुँच कर विस्फोट होता है। समाज में ऐसी स्थिति तब उत्पन्न होती है जब प्रशासन कुछ न कर पाने की स्थिति में आ जाती है और तब जनाक्रोश सहसा फूट कर सब कुछ तहस- नहस कर देता है। इस समय जनता के सामने सबसे अहम मुद्दा बढ़ती हुई किमतों को लेकर है। आज मध्यम वर्ग से लेकर समाज के गरीब तबकों मे एक ही स्वर सुनाई दे रहा है कि क्या करें किस तरह अपने परिवार को चलायें ,बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दिलाएं एवं घर में विमार चल रहे बड़े बुजुर्ग मरीज का इलाज कैसे कराएं कुछ भी समझ में नहीं आता। पिछले ढेड़ सालों में दवाओं की कीमतों के साथ-साथ लगभग सभी वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऊपर से नकली दवाइयों, खाद्यान्न से लेकर मिट्टी के तेल व पेट्रोल तक में मिलावटखोरी दूध, घी से लेकर नकली दवा बनाने वालों एवं मिलावटखोरों पर अनेकों बार छापे डाले जाते रहे, कुछ एक दिनों तक मीडिया से तरह- तरह के समाचर पत्रों में छपते रहे, अंत में इस संम्बंध में क्या हुआ उसका अता पता ही नहीं चला। अभी-अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र प्रदेश में प्रेट्रोल में मिलावट करने वाले गैंग पर एक अधिकरी द्वारा छापा मारा गया तो वे अपने जान से हाथ धो बैठे। इस घटना से हमारे समाज के उन बचे गिने-चुने कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों एवं ईमानदार व्यक्तियों के मध्य क्या संन्देश गया कि ईमानदारी करो और जान से हाथ धो बैठो। आज हमारे समाज में शासन ही भ्रष्ट्रजनों को बचाने के लिए उन्हे अंगरक्षक देती है और निरीह ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति खुलेआम भ्रष्ट्राचारियों के शिकार होतेरहेंगे तो समाज के छुपे हुए गद्दारों-भ्रष्ट्रजनों, जमाखोरों और मिलावटखोरों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले लोग यदि धीरे-धीरे खत्म हो जायेंगे तब हमारे देश और समाज का एक वीभत्ष रुप उभर कर हमारे सामने होगा उस स्थिति की परिकल्पना करके आज साधारण जनमानस के रोंगटे खड़े हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमारे समाज में घटने वाली ऐसी घटनाओं पर कुछ एक दिन बड़े ही गर्मजोशी के साथ समाचार पत्रों में छपने के साथ-साथ अधिकारी वर्ग सक्रिय रहते हैं उसके बाद वही मिलावटखोर दुसरी जगह अपना धंधा शुरु कर लेते हैं और सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है। और कभी न खत्म होने वाला सिलसिला पुनः शुरु हो जाता है। दरअसल यहां कोई ऐसा नियम-कानून और उसे शक्ती से लागू करने वाला वर्तमान समय मे नहीं दिखाई दे रहा है। शायद भविष्य में इस काली रात में कोई उजाले की एक किरण दिखाई पड़े।
मनुष्य का ज्ञान सामाजिक व्यवहार से या बाहरी दुनिया में, उत्पादक–कार्य या भौतिक संम्पर्क के माध्यम से पैदा होता है। अपने आरम्भिक काल में हमें इन्द्रियबोधी ज्ञान होता है, जो कि हमारे इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया गया या वाह्य प्रभावों पर आधारितहोता है। लेकिन यह प्रत्येक मनुष्य में धीरे–धीरे चिन्तन-मनन एवं विचार–विमर्श के माध्यम से और तर्कसंगत ज्ञान के धरातल पर पूर्णतः विकसित होकर अनेकों सिद्धान्तों को जन्म देती है, और यह ज्ञान धीरे-धीरे तर्कसंगत ज्ञान की अवस्था में आ जाने पर वाह्य समाज व दुनिया के सुधार के लिए मनुष्य द्वारा व्यवहार में लाया जाता है, और लगातार इस प्रकार का प्रयास करते रहने से ज्ञान पहले से और अधिक सशक्त, समृध और प्रखर होकर सामने आता है। ज्ञान में समाज और प्रकृति दोनों शामिल हैं। इस तरह मानवीय अभिकर्ता इसे बदलने का प्रयास करता है या खुद इसके द्वारा बलद जाता है।इसमें कोई अलग-अलग आदमी ही नहीं वल्कि सम्पूर्ण जनसमुह या समाज होता है। मनुष्य के ज्ञान में केवल उतनी ही बातें सामिल होती हैं, जो उसने अपने समाज व व्यवहार के माध्यम से प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त वह ज्ञान जो बोल-चाल और पढ़ने-लिखने से या अपने को विस्तारीत करके प्राप्त किया है। इस तरह यह एक अन्तःचक्रिय क्रिया है। ज्ञान अर्जित करने की कोई समय सीमा न होते हुए भी मनुष्य के इच्छा शक्ति से जुड़कर सीमावद्ध हो जाता है।
सच्चाई को आप अपने व्यवहारों से ढूंढ सकते हैं, और उसे व्यवहार करके परख सकते हैं। हमारी इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान को सक्रिय करने पर तर्कसंगत ज्ञान का विकास होता है, फिर उसे हम अपने वाह्य समाज में स्थापित करने का प्रयास करते हैं। इसी तरह यह प्रक्रिया दुहराते हुए ज्ञान की अन्तर्तस्तु को एक उच्चतर स्तर पर ले जा सकते हैं, और यह ज्ञान की एक द्वंद्वात्मक स्थिति है, क्योंकि ज्ञान का स्तर, अनेकों दिशाएं, अनेकों रुप में हो सकती है।
1- अमृत या ज्ञान को देने से पहले उसकी पात्रता देखी जाती है।
2-अच्छी और सुन्दर अभिव्यक्ति ही मनुष्य के जीवन की सुन्दरता है।
3-सुन्दर वाणी ही मनुष्य के व्यक्तित्व की सुन्दरता है।
4-अच्छाई या बुराई की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है।
5- एक माँ अपने सात बच्चों का पेट भर लेती है, लेकिन सात बच्चे मिलकरभीएक माँ का पेट
नहीं भर पाते हैं।
6- अमृत को यदि सूराख दार पात्र में उड़ेल दिया जाए तो भी बह जएगा।
भले ही आज हम गांधी जी को भूल गए हैं लेकिन आज दिनांक – 30 जनवरी 2011 को रविवासरीय हिन्दुस्तान के मंथन पृष्ठ संख्या-18 पर “गांधी की प्रासंगिकता पर इतनी बहस क्यों” नाम से प्रकाशित आपका लेख पढ़ कर हमें गांधी जी की याद दिलाता है। इस लेख के संम्बध में आपसे यह कहना है कि लेख की शुरुआत आपने इस पंक्ति से किया है कि “ चालीस साल पहले। बापू को गए हुए तब दो दशक भी नहीं हुए थे। हमारी पीढ़ी के लोग.................। ” आपका लेख पढ़ कर हमें यह मालूम पड़ता है, कि गांधी जी मृत्यु के साठ बर्ष होने को हैं। उसी समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ पर “ बापू का अंतिम दिन ” के शिर्षक जीवन झांकी की के कुछ चित्रों के उपर तीन पंक्तियों में से शुरुआत की पंक्ति में “ गांधी को गुजरे आज 63 बरस हो गए। ” लिखा है। जो कि स्पष्ट है। इतने बड़े समाचार पत्र में छपा संम्पादीक पृष्ठ मंथन पृष्ठ की विश्वनियता पर कुठारा घात के समान है यह दोनों वक्तव्यों में सही किसको माना जाए। इस प्रकार की संसय पूर्ण जानकारीयों से हमारी आने वाली पीढ़ीयाँ गांधी जी की मृत्यु दिवस और जन्म दिवस के वारे में दिग्भ्रमित अवश्य हो जायेगी।
-->
भ्रष्टगण से गणतंत्र तक
दिनांक – 28 जनवरी 2011
विदेशी के स्विस बैंक में देश के कुछ भ्रष्ट लोगों का काला धन जमा हैं। यह बात आज से नहीं बल्कि बिसियों सालों से सुनने में चला आ रहा है। जरा आप सोचिए इस दरमियान न जाने कितनी सरकारें आयी और चली गई। जहाँ तक याद पड़ता है, यह मुद्दा वी0 पी0 सिंह सरकार के सत्ता में रहते हुए उठी थी। लेकिन उसे घुमा फिरा कर यह प्रकरण दबा दिया गया। यदि हमारे देश के नेता, मंत्री और नौकरशह इनमें से कोई एक भी तंत्र सही होता तो बहुत पहले ही दोषियो को सजा मिल जाती और देश का सारा का सारा धन बापस आ जाता और यह मुद्दा कभी का खत्म हो चुका होता। यहाँ एक बात जरुर है कि स्विटजरलैंड का कानून भी समय-समय पर इसके आड़े आता रहा लेकिन कई साल गुजर जाने के बाद ही सन 2009 में स्विट्जरलैंड और भारत के बीच दोहरे काराधान के एक संधि पर हस्ताक्षर जरुर हुए हैं, लेकिन यह संधि स्विस बैंक में जमा कालेधन को वापस देश में लाने की गारंटी नहीं देता है। यह तो एक नाममात्र का प्रयास भर है।आज दिनांक -24 जनवरी 2011 को गूगल समाचार में प्रकाशित यह खबर पढ़ा कि स्विस बैंक में खाता रखने वाले कुछ एक लोगों के नाम पता चल गये हैं, लेकिन कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए भारत सरकारकी ओरसेश्री प्रणब मुखर्जीने उन लोगों के नाम सार्वजनिक करने से मना कर दिया।“ग्लोबल फिनेंशियल इंटीग्रिटी”संस्था के अनुसार केवल सन् 2000 से 2008 तक चार करोड़ आठ लाख रुपये (4.8 लाख करोड़ ) देश से बाहर भेजे गये। इससे पहले न जाने और भी कितना कुछ गया होगा उसकी सटीक जानकारी नहीं है। लेकिन सरकार का कहना है कि “डबल टैक्सेशन समझौता”या “एक्सचेंज ऑफ टैक्सेशन इन्फोर्मेशन एग्रीमेंट” के रास्ते या इनकम टैक्स विभाग यदि टैक्स चोरों के खिलाफकेस दर्जकरें तो इस मुद्दे को आगे बड़ाया जा सकता है। क्योकिआयकर अधिकारियों के पास कानूनी ताकत है, जिसके तहत वे कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। इस संम्बंध में देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी केंन्द्र सरकार को झिड़की लगाई और कहा काले धन को केन्द्र टैक्स मे क्यों उलझा रही है। खैर भविष्य में जो भी हो काले धन को देश में वापस लाने के लिए, दृढ़ इच्छा शक्ति से आज तक किसी भी सरकार द्वारा उपयुक्त कार्यवाही या सार्थक प्रायास किया ही नही गया। काले धन रखने वालों के नामो की जानकारी करने से लेकर न जाने और क्या-क्या पापड़ बेलते देखे गए इसके लिए देश के मंत्री से लेकर उच्च पदस्थ अधिकरीयों के स्विट्जरलैंड दौरों पर देश के जनता के गाड़ी कमाई का सफेद धन, अनेकों बार काले धन को देश में वापस लाने पर खर्च किया गया, और यह सफेद धन भी काले धन में तबदील हो गया। काला तो काला कलेरंगमें चाहे कोई भी रंग मिला दीजिए बह रंग काला हो जायेगा। खैर यह जरुर है कि यदि कोइ भी सरकार दृढ निंश्चय कर ले कि स्विसबैंक में पड़ा काला धन देश में वापस लाना है तो इस काम को सही दिशा देने के लिए अन्य तरीकों पर भी गौर करना चाहिए था। लेकिन किसे पड़ी है कि इतना जिद्दो-जहद करें उससे उन्हे क्या मिलेगा। ऊपर से ऐसे लोगों से पगां, शत्रुता मोल क्यों लिया जाये। यह मुद्दा हमारे देश मे अभी तक जिंदा है, यह अपने आपमें एक बहुत बड़ी बात है, नहीं तो इतने सालगुजरजाने के बाद लोगों द्वारा इसको भुला दिया जाता। हमारे हिन्दुस्तान के नेता, मंत्री और नौकरशाह जो लोग शायद कभी नहीं सुधर पाएंगे जब तक कि वे खुद नहीं सुधरना चाहेंगे, या जब तक कि उनका कोई बहुत बड़ा अनिष्ट या घटना न घटित हो जाए। भारतीय सहिष्णुता के लिए जाने जाते हैं। सहिष्णुता का यह मतलब कतई नहीं होता है कि आपका घर लुट रहा हो और आप तमाशाई बने देखते रहें, उसे तनिक भर भी रोकने का साहस न जुटा पायें या रोकने की जरुरत महसूस न करें। वह भी जब कोइ विदेशी नही वल्कि अपने ही देश का हो यह तो सरासर दब्बू और कायरता की पहचान है। ऐसे में हमारे देश के लोगों द्वारा चुने जाने वाला सरकार या नेताओं से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं ?अक्सर यह देखा गया है किदब्बू या कायर लोग जब कोई भी काम करते हैं तो उसे छुपाते हैं किसी को पता न लग जाये इस बात का भरसक प्रयास करते रहते हैं, उन्हे इस बात का हमेशा डर लगा रहता है क्योंकि दुसरों के द्वारा या सामाजिक विरोध-प्रतिक्रिया और उठने वाली बातों को वे सहन नहीं कर पाते हैं। या उसका सामना करना नही चाहते हैं। जिससे उनका सामाजिक दुर्दशा एवं स्तर पर फर्क पड़ता है, घर-परिवार की या निजी बातें तो एक अलग मुद्दा है, यही आदतें उन्हे चोरी करने को प्रेरित करती रहती है, और हमेशा डरे-सहमे से रहते हैं। हमारे समाज में ऐसे लोग की एक बड़ी संख्या हैं, जिनके पास यह आंकलन करने की क्षमता नहीं होती है, कि कौन सी बात कब कहाँ और किससे कहना है या नहीं। अभी-अभी हमने सुभाष जयन्ती और छब्बीस जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया। प्रत्येक छब्बीस जनवरी और पंन्द्रह अगस्त के दिन हमरे देशवासीयों का मष्तक अपने आप गर्व से उच्चाँ हो जाता है, आजादी की शुरुआती दौर से कुछ वर्षों तक सम्पूर्ण राष्ट्र का जन समुदाय जोश एवं एक नयी उर्जा से ओतप्रोत दिखाई पड़ता था। सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था कि हमारे देशवासी तीन सौ बर्षो तक अंग्रेजों के गुलामियत के जंजीरों से जकड़े रहे हैं अतः हमें एकाएक मिली इस आजादी की इतनी बड़ी खुशी को पा कर हमारा दिमाग एकदम स्वतंन्त्र होकर अपनी सुध–बुध ही खो बैठें और इसका फायदा कोइ अन्य रुप से उठा लें इसलिए हमारी स्वतंत्रा को अछुण रखने के लिए देशवासियों को धीरे-धीरे आजादी का अहसास होने दिया जाये। परन्तु हुआ वही जो शायद नहीं होना चाहिए था। देशवासियों को अचानक आजादी की खबर सुना दी गई और देश की जनता उन्मादी खुशीयों मे तल्लिन हो गई, घर-घर घी के दीपक जलाये जाने लगे। मुट्ठी भर लोगों ने देश के साशन अपने हाथ में लेकर सत्ता पर काबिज होने की तैयारी कर ली। उस समय साशन अपने हाथ में लेने वाले लोगों में से जो उन्ही का विरोध करते उन्हे देश के संविधान लिखने में खुछ एक को अन्य प्रशासनिक कामों में लगा कर जनता से उन्हे दूर रक्खा गया। उस वक्त देशवासी इतनी बड़ी खुशी के आगे किसी भी अन्य नेता या लोगों की बात को तबज्जो नही दे पाये इसी बजह सेकिसी का ध्यान कौन क्या कर रहा है, इस ओर गया ही नहीं इस तरह बचे खुचे उनके विरोधी भी अलग-थलग पड़ गये। और सही समय देख कर वही लोग सत्ता पर काबिज हो गये। जो बिज हमारे जन-मानष द्वारा आज बोया जायेगा बह कल उन्हे या उनके पूर्वजों को कटना ही पड़ेगा और बही फसल हम वर्तमान में काट रहे हैँ। सत्य बहुत कड़ुवा होता है और कड़वी चीज किसी को भी पसंन्द नहीं है। दवाई कड़वी जरुर होती है, लेकिन दवाई ही फायदा पहुँचाती है।
*भारतऔर पाकिस्तानके मध्यबंटवारे पर जब-जब सेमिनार हुए तब-तब यह देखा गया कि उस पर पानी फेरने केलिए मुस्लिम प्रवक्ताओं को बार- बार यह कहते हुए सुना गया है कि यह सब कुछतो प्रतिष्ठित मुसलमानों की कारस्तानी थी, साधारण मुस्लिम जनता का इससे कोई लेना देना नहीं था।इसे मानना पड़ता है और हम मान भी लेते हैं।चलिएउसे छोड़ देतेहैं,लेकिनयदि सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्टको लागू करने की मांग करनेवालों की हैसियतको देखा जाए, तो फिर वही मंज़रयादआ जाताहै कि सबके सब कुलीन वर्ग के ही लोग हैं। कमसे कमये वे लोगतो नहीं हैं जिन्हें लाभ मिलना चाहिए।ऐसी दशा में फिर से कोई ऐसी गलती फिर से दुहरायी न जाये कि उनकी रपटों को लागू करके एक और बंटवारे का मार्ग कोखोल दिया जाय।देश व राष्ट्रीय एकता को अक्षुणरखनेकी गरज सेउन्हें कूड़ेदान में फेंक दियाजाना चाहिए।एक बातध्यान देनेयोग्यहैकि इससे केवलप्रतिष्ठित मुसलमानों की राजनीतिक कुचेष्टाओं को ही क्षतिपंहुचेगी और कथित लाभार्थी व साधारण मुस्लिम जनता को इससे कोई भी फर्क नही पड़ेगा।
इसका पहलाकारण तो यह कि मुस्लिमकुलीन वर्ग उन लाभों को साधारण मुस्लिम जनता तक पहुँचने ही नहीदेंगे।जैसा कि हिन्दू दलितों के आरक्षण के साथ हुआ। इसलिए किआरक्षण की मांग उनकी है ही नहीं।और न ही इसके लिएउन्होंने कोई संघर्ष किया। याकरने की ज़रुरत भी नहीं थी, क्योंकि वे गरीब भले रहे होंपर दमन केशिकारनहीं थे।उन्हेंअपनीधार्मिक व्यवस्था से कोई शिकायतनहींहै, और उससे उन्हें कोई परेशानीनहीं है। फिर वे दलित कैसे कहे जाएँऔर क्यों। यहींपरयहध्यान देने की जरूरत हैकि हिन्दू दलितों को आरक्षण उनके आर्थिकउत्थान के लिए नहीं, बल्किउनके सामाजिकसम्मान और उत्थान केलिएहै , दरअसलइसी सम्मान व उत्थान के लिए ही लडाईहै। ऐसा वे स्वयं समझते औरकहते हैं।यदि ऐसा नहीं है तो आर्थिक दशा अच्छी हो जाने के बाद भी बड़े बड़े दलित अधिकारी वर्गआरक्षण मुद्दा छोड़ चुके होते।
सामाजिक प्रतिष्टाको हासिल करनेके लिए क्याक्याकरना पड़ा, इसकीशुरूआत यदि अंबेडकर युगसे करें तो उन्होंने इसके लिए क्या-क्यापापड़ नहीं बेले, क्या क्या नहीं किया। हिन्दू धर्मकी व्याख्याकरते हुए उसकीबखिया तक उधेड़ डालीं, उसका तार तार, रेशारेशा छिन्न भिन्न करके तहस-नहस कर दिया।कथित पवित्रकिताबों वेद-पुराणों की अवमानना की मनुस्मृतिजलाई, देवीदेवताओं को गालियाँदीं, संतों- महात्माओं पर कीचड़उछाले, ब्राह्मणवादकी ऐसी -तैसीकी,गाँधी जीसे भी पंगा लिया, वाइसराय से भी जिद किया, कुछ करनाबाक़ीनहीं छोड़ा यहाँतक कि स्वयंधर्मपरिवर्तन कर बौद्धभी बन गये। इतना सब कुछ करने के बाद, अभीथोड़ा सा हीहासिल करसकेहैं।आज भी जब तब उत्पीड़नकेशिकार होते ही रहते हैं, औरउनकायह संघर्ष अभी भी जारी है।
इसके ठीक विपरीतमुसलमान भाइयोंने क्या किया। मुसलिम वर्ग इस्लामसे चिपके रहे, उसके वफादारबने रहे, उसका गुणगान करते रहे, रोजे नमाज़ के पाबंदरहे ,मजारोंपरचादरें चढ़ातेरहे।कोईपरेशानी नहीं है ? इस्लामतो एकपूरीसामाजिकव्यवस्था है, इसमेगरीबों और मजलूमों काभीइंतजाम है। दानऔरज़कातकी व्यवस्था है, यह इसीलियेकी गयी, जिससेगरीबों, मजलूमोंका भरण-पोषणहोसकेऔर वेइसधर्म को छोड़ कर किसी अन्य धर्म को अपनाने न लगें । इस कथनमेंभीकोईअतिशयोक्ति नहीं है कि इनकी इसी व्यवस्थाओंके कारणआज तककोई भी एक ऐसाउदहारण नहीं है किइस्लाम याईसाई अपने धर्म से निकलकरकिसीदूसरेधर्म को अपनाया। यह तोकेवल एकमात्रहिन्दू धर्म ही है, जिससे बहुत सारे लोग निकल कर इस्लामया ईसाईधर्म को अपना लेते हैं और समता, बराबरी,भाईचारा, मानवाधिकार, स्त्री अधिकारऔर न जाने क्या-क्या स्वर्ग कासब्जबागदेखइससे निकलकरइनमजहबों की गोदेंभरते रहे।ज़ाहिर सी बात है कि उन्हेंहिन्दू धर्म में परेशानी थी। यह भी सच है कि उनमजहबों के गुण अबभीउसीप्रकार गाये जाते हैं।कहीं कोई क्षोभ, पश्चातापयापुनरीक्षण नहीं। वे अब भी वैसे ही समतावादी, मानवतावादीहोनेकेलिएख्यातिप्राप्त करने की होड़ में लगें हैं। इसे सबसेउचितऔर श्रेष्ठसिद्ध करने में लादेन की अलक़ायदा सेलेकरडाक्टरजाकिर नाइकव एकछोटे सेछोटे गाँव का गरीब सेगरीबमोलवी-मौलानातक लगाहुआहै।उधर सुदूरजंगलोंऔर आदिवासीक्षेत्रोंमेंईसाईमिशनरियां भी यही काम कररही हैं। इनकी वकालत मेंभारतकेमहानबुद्धिजीवी वर्ग भी यही कहते हैं कि अताताई हिन्दू धर्म से ये निकल कर न जायंतो क्या करें ! ज़ाहिर है कि वहाँ उनको एक भविष्य दिखाई देता है।
इस बात से यह बात प्रमाणितहो जाता है और जहाँतक हमें जानकारीहै कि इनमजहबों के इन्ही सदगुणों के कारण किसी भी ईसाई या मुसलिम मुल्कोंमें आरक्षणकीकोई मांगया कोई व्यवस्था सुनाईनहीं देती है।सबउनकी सुराजके कारण है, जोहिन्दू धर्म में नहींहै। और यह हिन्दू धर्म केवल हिंदुस्तान में ही है।
ऐसी दशामें प्यारे गरीबईसाई - मुस्लिम भाइयोंसे यह पूछना है कि वेहिन्दू धर्म की जेहालत - जलालत में क्योंलौटना चाहते हैं ? आरक्षणव्यवस्था उनकेअपनेदलितोंके लिए की गयी व्यवस्था है। वह भी उनकी गरीबेदूर करने के लिए नहीं, वल्कि उन्हें सामाजिक सम्मानदिलाने केलिए है। गरीबी और गरीबोंकेलिए तो बीपीएल कार्ड है। यदिआप में तनिक भीईमानदारी हैतो उनके हकमेंआपकृपया छीछा, छीजन नकरें। यही न्याय की बात होगी, अन्यथाउन परआप से भी अन्याय होगा। वे लोंग तो पहले सेहीदबे हैं।
निवेदनहै कि इनसच्चर , रंगनाथमिश्र लोगोंपर न जाएँ और अपनी नैतिकता की आवाज़ कोसुनें। हिन्दू धर्म की तमाम बुराईयों या अच्छाईयोंमें एक यह भी है कियहाँ एक ईश्वर और एक धर्म सन्देशवाहक नहीं होता है वल्कि तमाम देवताएँ होतेहैं। इसी तरह के मनुष्यदेवता ही सच्चर, रंगनाथमिश्र जैसे लोग ही हैं।महात्मा गाँधी ने तो अपना जान ही गँवा दिया पड़ोसी मुल्क को कुछ करोड़ रूपये भारतसरकार से दिलवाने के लिए। हिन्दू के दधीच तो आपके लिए अपनाअंग -अंग दानकरने के लिए तैयार हो जायेंगे। परन्तु उसे लेनाक्याउनके लिए उचित और शोभनीय होगा?
इस पर गंभीरतासेसोचाजाना चाहिए कि देशका साधारण आदमीदेवता नहीं हो सकता वह एक सामाजिक प्राणी है। सेकुलरिज्म या धर्म निरपेक्षता का एक अर्थ पारलौकिकता के अलावाइहलौकिकता भी है। अब जनता अपने महात्माओं के विपरीत धर्मों की साजिशें औरउनकी राजनीतिक रणनीतियां भी बखूबीसमझतीहै।अब भारतीयलोगोंको मूर्ख बनाना इतना आसान नही रह गया है। जनता ने देख लिया किइसीआयोग के एक सदस्य ने दलितव अन्य धार्मिकसमुदायोंके लिए आरक्षणकेविरुद्ध हीआख्या दे डाला और वह सर्वसम्मत भी नहीं है। हिन्दू दलितों की स्थिति में अन्तर कोयहाँ रेखांकित किया गया है। आरक्षण के समर्थककोई भी यहबताये कि मोहम्मदसाहेब केकार्टूनके विरोध मेंलाखों की संख्या में गरीबमुसलमानलखनऊऔर अन्य जगहोंपर निकल कर आये ,क्या इतने ही संख्या में लोग अपने गरीबी केविरोधमें सामने आयेहैं ? इस्लाम में जो लोग दलितावस्था कोझेल रहे हैं क्या उनमें से कोई इसके लिए सामने आये या कुछ कर रहे हैं? तसलीमा नसरीनकोवीजामुसलमानोंके भय से नहीं दिया जारहा है , और भारत में इस्लाम कीताक़तउन्हीं के गरीब मुसलमान वर्गही है, न की सारे अमीर लोग। इसीलिये , गौर सेदेखें , सारे अमीर उन्हे आरक्षण दिलाने के लिए ऐंडी चोटी एककर रहे हैं,परन्तुअब यह नहीं हो सकता है, किजबसमता का मज़ा लेना हो तो ईसाई बनजांयें , इस्लाम ग्रहण कर लें, जब आर्थिकसुविधा लेनी होतो जय श्रीराम का नारालगायें। यदिलेंना ही है तो हिन्दू धर्म के दोज़ख और नर्कमेंआइये, यहीं से गएथेतो अब क्यों पड़े हैं उसजन्नत में ! वरना तो यदि सेकुलर देश में आप तसलीमा को वीजा नहीं देने देंगे , तोहिन्दू देश भी आपकोकोई आरक्षण देने में असमर्थहै। कृपयाक्षमा करें।