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Sunday, February 27, 2011

एक के बाद एक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी


एक के बाद एक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी


दिनांक – 27/2/2011
विदेशी बैंको मे जमा धन के मुद्दे पर अभी तक हम सभी ने बहुत कुछ लिखा पढ़ा और सुना अब विदेश मे जमा काले धन की स्वदेश वापसी मुद्दे पर हमारी सरकार गंभीर नही दिखाई पड़ रही है। बहुत दिनो तक इस पर होहल्ला चला अब इस मुद्दे पर से सभी लोगों का ध्यान हट गया, या धीरे-धीरे देर सवेर हट जाएगा सबके-सब एकदम खामोश और अब शुरु हुआ, अपने ही देश मे बैठे अरुण मिश्रा जैसे UP SIDC के चीफ इंजीनियर स्तर के एक कर्मचारी ने अकूत धन बैंको के वेनामी खातों मे और अनेको अचल संपत्तियां इकट्ठा होने के मुद्दे ने जोर पकड़ लिया है। इसकी जानकारी अभी CBI द्वारा उनके घर से लेकर कार्यालय पर मारे गये छापे से यह मालूम हुआ कि मनी लाँण्ड्रिंग के मामले के  रहस्य पर से पर्दा उठते-उठते एक अरब रुपए  के घोटाले होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। बहुत मात्रा मे धन, चल-अचल संपत्तियां अरुण मिश्रा ही नही ऐसे अनेको भ्रष्टाचारियों के लाकरों से लेकर उनके कब्जे मे फँस कर सड़ रहे होंगे। इस तरह हमारी अर्थव्यवस्था का सफेद धन, काले धन मे बदल कर हमारे अर्थ व्यावस्था से बाहर हो गया। जिसका प्रभाव परोक्ष-अपरोक्ष रुप से बाजार भाव से लेकर आर्थिक गती विधीयों मे पड़ना तय है। हमारे देश की गरीब जनता कठोर मेहनत करने के बावजूद और गरीब होता जा रहा है, धनी और धनी। इस पर भी हमारे देश की पार्टीयाँ और सरकार आर्थिक संपन्नता की बात करती है आर्थीक संपन्नता के मामले मे हमारे देश की गरीब जनता आर्थिक संपन्न भले ही न हुए हो भ्रष्टाचारी जनता जरुर आर्थिक संपन्न हो गये हैँ और हमारी सरकार कागजों मे ऐसे जनता की संपन्नता का आकड़ा दे कर हमारे देश की आर्थीक तरक्की की बात बड़े गर्व के अपने पार्टी की उपल्बधीयों का वखान समाचार पत्रो से लेकर दुर्दशन पर समय- समय करती रहती है। हमारे देश मे आर्थिक संपनता और समानता तभी आ सकती है जब पार्टीयां और सरकार वास्तव मे गरीब जनता के उत्थान और संपनता के लिए ईमानदारी से नही सोचेगी। यदि हमारे देश मे भ्रष्टाचार पर सर्वेक्षण कराया जाए तो देश की कुल आबादी के 25 से 30 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह के भ्रष्टाचार मे लिप्त पाये जाएगें। भले ही छोटा आदमी छोटा भ्रष्टाचार बड़ा आदमी बड़ा भ्रष्टाचार इन सभी भ्रष्टाचारीयों का काला धन वटोर कर देश के गरीब जनता मे समान रुप से बांट दिया जाना चाहिए। क्यों कि यह उन्ही लोगो का और हमारे देश की जनता का ही धन है और इस धन की कमी की बजह से न जाने कितने गरीबों को कफ़न तक से वंचित रहना पड़ा होगा।

Thursday, February 24, 2011

सफलता चाहिए कि...... ?


सफलता चाहिए कि...... ?
दिनांकः-25/2/2011
किसी भी मनुष्य को अपने जीवन में सफलता पाने का एक सिद्धांत है। आप परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लें या परिस्थितियों के अनुकूल स्वंम बन जाएं। सभी परिस्थितियों में एक जैसा रह कर विचलित न होना सफलता पाने की पहली शर्त है। न जाने हमारे जीवन में कब,  कौन-सी समस्या किस रुप में आ जाए। इसके लिए हमें हमेशा चौंकना और सजग प्रहरी की तरह रहना पड़ता है। जीवन में जिन का तरीके और जिनके मर्यादित रुप से जीवन निर्वाह करने एवं प्रबंधन का एक सूत्र यह है कि यदि आप समाधान का अंग नहीं हैं, तो फिर आप खुद एक समस्या हैं। समाधानकारी चरित्र हमें जीवन तत्वों का सही उपयोग करते हुए व्यक्तित्व विकास की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है। ऐसा न हो कि आज सफल हुए, लापरवाही के कारण या किसी अन्य बजह से भविष्य में सफलता आपके जीवन से फिसल जाए। जिस तरह  ताश के खेल में जो अपने पत्तों को छुपाना जानता है उसे ही एक अच्छा खिलाड़ी समझा जाता है। लेकिन जिन्दगी के मामले में यह विपरीत है। छुपाना व्यक्तित्व का एक दोष है। इसके ठीक विपरीत खुलापन एवं उदारता शांति का प्रतीक है। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व की पारदर्शिता है। वास्तव में एक मनुष्य का जीवन और व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए जैसे किसी पुस्तकालय की मेज पर पड़ी हुई एक खुली किताब या समाचार पत्र जो चाहे जब भी पड़ ले। दुरुहता एवं छिपाव, से व्यक्ति के अन्दर की सहजता समाप्त हो जाती है। अक्सर यह देखने में आता है कि खुले दिलो-दिमाग के लोग अपनी उन्नति में अपने से जुड़े लोगों को भी समान रुप से सम्मिलित करते हैं। अपने जीवन में खुलापन बनाये रखने से व्यक्ति के अन्दर सत्य का निर्माण होकर हिम्मत एवं साफ सुथरी चीज को पसंन्द करने जैसी व्यक्तित्व का निर्माण होता है। वर्तमान समय में यह देखने को मिल रहा है कि लोग अकारण ही छोटी से छोटी बात पर भी बहुत आसानी से झूठ बोलते रहते हैँ, ऐसे लोगों पर यह यकीन करना बहुत ही कठिन हो जाता है, कि उनके द्वारा कही बातों में से कौन सी सच और कौन झूठ। मेरे समझ से यदि मनुष्य अपने जीवन में झूठ के स्थान पर सच को आधार बना कर चले तो निश्चित रुप से मनुष्य का जीवन निर्भय और दुखः कलेश से मुक्त तो होगा ही साथ ही साथ हम अपने जीवन में निश्चित रुप से सफल भी होंगे।

Tuesday, February 15, 2011

देख तेरे इन्सान की हालत क्या हो गयी भगवान........


देख तेरे इन्सान की हालत क्या हो गयी भगवान.........
दिनांक -14/02/11
आज हमारे देश में चारों तरफ  आम आदमी खाद्य वस्तुओं की महंगाई से लेकर सभी वस्तुओं में 17 फीसदी का इजाफा और भ्रष्टाचार की वजह से सरकार में उसकी आस्था की जड़ों को हिला कर रख दिया है। आज देश के अधिक्तर लोगों के अन्दर यह बात पैठ गयी है कि सरकार और नौकरशाह खूब पैसे बना रहे हैं, जबकि जनता को उसके एक-एक बुनियादी वस्तुओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। समाज के हर व्यक्ति के अन्दर एक मंद अग्नि सी सुलगती हुई दिखाइ दे रही है। लोग परिस्थियों से संघर्ष करते हुए, देखते हुए, सुनते हुए, झेलते हुए, समाज के प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में एक सुशुप्त ज्वालामूखी का निर्माण हो चुका है। प्रत्येक समाज की सहन शक्ति का एक निश्चित मापदंड है। हमारे समाज के कुछ लोग इस समय तो मौन हैं, कुछ एक लोग लगातार अपने शब्दों से, और कुछ लोग अपने लेखन द्वारा समय-समय पर इस पर कुठाराघात करते चले आ रहे हैं। कुल मिला कर समाज का प्रत्येक मनुष्य अपने घर से लेकर समाज तक में होने वाले परिर्वतनों, घटित घटनाओं से बहुत प्रभावित होकर क्या करे या न करे की स्थिती तक पहुँच गये हैं किसी भी समाज की यह स्थिति अत्यन्त विस्फोटक या खतरनाक होती है। अभी-अभी हमने मिश्र की जन आन्दोलन की विस्फोटक स्थिति को पढ़ा, सुना व देखा। ऐसी स्थिति अचानक पैदा नहीं होती है, बल्कि यह स्थिति अनेकों वर्षों के बाद समाज की सहनशीलता लांघ कर विस्फोटक स्थिति के उच्चतम शिखर पर पहुँच कर विस्फोट होता है। समाज में ऐसी स्थिति तब उत्पन्न होती है जब प्रशासन कुछ न कर पाने की स्थिति में आ जाती है और तब जनाक्रोश सहसा फूट कर सब कुछ तहस- नहस कर देता है।  इस समय जनता के सामने सबसे अहम मुद्दा बढ़ती हुई किमतों को लेकर है। आज मध्यम वर्ग से लेकर समाज के गरीब तबकों  मे एक ही स्वर सुनाई दे रहा है कि क्या करें किस तरह अपने परिवार को चलायें ,बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दिलाएं एवं घर में विमार चल रहे बड़े बुजुर्ग मरीज का इलाज कैसे कराएं कुछ भी समझ में नहीं आता। पिछले ढेड़ सालों में दवाओं की कीमतों के साथ-साथ लगभग सभी वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऊपर से नकली दवाइयों, खाद्यान्न से लेकर मिट्टी के तेल व पेट्रोल तक में मिलावटखोरी दूध, घी से लेकर नकली दवा बनाने वालों एवं मिलावटखोरों पर अनेकों बार छापे डाले जाते रहे, कुछ एक दिनों तक मीडिया से तरह- तरह के समाचर पत्रों में छपते रहे, अंत में इस संम्बंध में क्या हुआ उसका अता पता ही नहीं चला। अभी-अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र प्रदेश में प्रेट्रोल में मिलावट करने वाले गैंग पर एक अधिकरी द्वारा छापा मारा गया तो वे अपने जान से हाथ धो बैठे। इस घटना से हमारे समाज के उन बचे गिने-चुने कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों एवं ईमानदार व्यक्तियों के मध्य क्या संन्देश गया कि ईमानदारी करो और जान से हाथ धो बैठो। आज हमारे समाज में शासन ही भ्रष्ट्रजनों को बचाने के लिए उन्हे अंगरक्षक देती है और निरीह ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति खुलेआम भ्रष्ट्राचारियों के शिकार होते रहेंगे तो समाज के छुपे हुए गद्दारों-भ्रष्ट्रजनों, जमाखोरों और मिलावटखोरों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले लोग यदि धीरे-धीरे खत्म हो जायेंगे  तब हमारे देश और समाज का एक वीभत्ष रुप उभर कर हमारे सामने होगा उस स्थिति की परिकल्पना करके आज साधारण जनमानस के रोंगटे खड़े हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमारे समाज में घटने वाली ऐसी घटनाओं पर कुछ एक दिन बड़े ही गर्मजोशी के साथ समाचार पत्रों में छपने के साथ-साथ अधिकारी वर्ग सक्रिय रहते हैं उसके बाद वही मिलावटखोर दुसरी जगह अपना धंधा शुरु कर लेते हैं और सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है। और कभी न खत्म होने वाला सिलसिला पुनः शुरु हो जाता है। दरअसल यहां कोई ऐसा नियम-कानून और उसे शक्ती से लागू करने वाला वर्तमान समय मे नहीं दिखाई दे रहा है। शायद भविष्य में इस काली रात में कोई उजाले की एक किरण दिखाई पड़े।

Saturday, February 12, 2011

ज्ञान का विज्ञान


ज्ञान का विज्ञान
दिनांक – 12 फरवरी 2011
मनुष्य का ज्ञान सामाजिक व्यवहार से या बाहरी दुनिया में, उत्पादक–कार्य या भौतिक संम्पर्क के माध्यम से पैदा होता है। अपने आरम्भिक काल में हमें इन्द्रियबोधी ज्ञान होता है, जो कि हमारे इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया गया या वाह्य प्रभावों पर आधारित होता है। लेकिन यह प्रत्येक  मनुष्य में धीरे–धीरे चिन्तन-मनन एवं विचार–विमर्श के माध्यम से और तर्कसंगत ज्ञान के धरातल पर पूर्णतः विकसित होकर अनेकों सिद्धान्तों को जन्म देती है, और यह ज्ञान धीरे-धीरे तर्कसंगत ज्ञान की अवस्था में आ जाने पर वाह्य समाज व दुनिया के सुधार के लिए मनुष्य द्वारा व्यवहार में लाया जाता है, और लगातार इस प्रकार का प्रयास करते रहने से ज्ञान पहले से और अधिक सशक्त, समृध और प्रखर होकर सामने आता है। ज्ञान में समाज और प्रकृति दोनों शामिल हैं। इस तरह मानवीय अभिकर्ता इसे बदलने का प्रयास करता है या खुद इसके द्वारा बलद जाता है। इसमें कोई अलग-अलग आदमी ही नहीं वल्कि सम्पूर्ण जनसमुह या समाज होता है। मनुष्य के ज्ञान में केवल उतनी ही बातें सामिल होती हैं, जो उसने अपने समाज व व्यवहार के माध्यम से प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त वह ज्ञान जो बोल-चाल और पढ़ने-लिखने से या अपने को विस्तारीत करके प्राप्त किया है। इस तरह यह एक अन्तःचक्रिय क्रिया है। ज्ञान अर्जित करने की कोई समय सीमा न होते हुए भी मनुष्य के इच्छा शक्ति से जुड़कर सीमावद्ध हो जाता है।
सच्चाई को आप अपने व्यवहारों से ढूंढ सकते हैं, और उसे व्यवहार करके परख सकते हैं। हमारी इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान को सक्रिय करने पर तर्कसंगत ज्ञान का विकास होता है, फिर उसे हम अपने वाह्य समाज में स्थापित करने का प्रयास करते हैं। इसी तरह यह प्रक्रिया दुहराते हुए ज्ञान की अन्तर्तस्तु को एक उच्चतर स्तर पर ले जा सकते हैं, और यह ज्ञान की एक द्वंद्वात्मक स्थिति है, क्योंकि ज्ञान का स्तर, अनेकों दिशाएं, अनेकों रुप में हो सकती है।
1- अमृत या ज्ञान को देने से पहले उसकी पात्रता देखी जाती है।
2-अच्छी और सुन्दर अभिव्यक्ति ही मनुष्य के जीवन की सुन्दरता है।
3-सुन्दर वाणी ही मनुष्य के व्यक्तित्व की सुन्दरता है।
4-अच्छाई या बुराई की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है।
5- एक माँ अपने सात बच्चों का पेट भर लेती है, लेकिन सात बच्चे मिलकर भी एक माँ का पेट
  नहीं भर पाते हैं।          
6-  अमृत को यदि सूराख दार पात्र में उड़ेल दिया जाए तो भी बह जएगा।

Sunday, January 30, 2011

गांधी की प्रासंगिकता

गांधी की प्रासंगिकता
दिनांक – 30 जनवरी 2011
आदरणीय शशि शेखर जी नमस्कार,
भले ही आज हम गांधी जी को भूल गए हैं लेकिन आज दिनांक – 30 जनवरी 2011 को रविवासरीय हिन्दुस्तान के मंथन पृष्ठ संख्या-18 पर “गांधी की प्रासंगिकता पर इतनी बहस क्यों” नाम से प्रकाशित आपका लेख पढ़ कर हमें गांधी जी की याद दिलाता है। इस लेख के संम्बध में आपसे यह कहना है कि लेख की शुरुआत आपने इस पंक्ति से किया है कि “ चालीस साल पहले। बापू को गए हुए तब दो दशक भी नहीं हुए थे। हमारी पीढ़ी के लोग.................। ” आपका लेख पढ़ कर हमें यह मालूम पड़ता है, कि गांधी जी मृत्यु के साठ बर्ष होने को हैं। उसी समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ पर “ बापू का अंतिम दिन ” के शिर्षक जीवन झांकी की के कुछ चित्रों के उपर तीन पंक्तियों में से शुरुआत की पंक्ति में “ गांधी को गुजरे आज 63 बरस हो गए। ” लिखा है। जो कि स्पष्ट है। इतने बड़े समाचार पत्र में छपा संम्पादीक पृष्ठ मंथन पृष्ठ की विश्वनियता पर कुठारा घात के समान है यह दोनों वक्तव्यों में सही किसको माना जाए। इस प्रकार की संसय पूर्ण जानकारीयों से हमारी आने वाली पीढ़ीयाँ गांधी जी की मृत्यु दिवस और जन्म दिवस के वारे में दिग्भ्रमित अवश्य हो जायेगी।

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भ्रष्ट गण से गणतंत्र तक
दिनांक – 28 जनवरी 2011
विदेशी के स्विस  बैंक में  देश के कुछ भ्रष्ट लोगों का काला धन जमा हैं। यह बात आज से नहीं बल्कि बिसियों सालों से सुनने में चला आ रहा है। जरा आप सोचिए इस दरमियान न जाने कितनी सरकारें आयी और चली गई। जहाँ तक याद पड़ता है, यह मुद्दा वी0 पी0 सिंह सरकार के सत्ता में रहते हुए उठी थी। लेकिन उसे घुमा फिरा कर यह प्रकरण दबा दिया गया। यदि हमारे देश के नेता, मंत्री और नौकरशह इनमें से कोई एक भी  तंत्र सही होता तो बहुत पहले ही दोषियो को सजा मिल जाती और देश का सारा का सारा धन बापस आ जाता और यह मुद्दा कभी का खत्म हो चुका होता। यहाँ एक बात जरुर है कि स्विटजरलैंड का कानून भी समय-समय पर इसके आड़े आता रहा लेकिन कई साल गुजर जाने के बाद ही सन 2009 में स्विट्जरलैंड और भारत के बीच दोहरे काराधान के एक संधि पर हस्ताक्षर जरुर हुए हैं, लेकिन यह संधि स्विस बैंक में जमा कालेधन को वापस देश में लाने की गारंटी नहीं देता है। यह तो एक नाममात्र का प्रयास भर है। आज दिनांक -24 जनवरी 2011 को गूगल समाचार में प्रकाशित यह खबर पढ़ा कि स्विस बैंक में खाता रखने वाले कुछ एक लोगों के नाम पता चल गये हैं, लेकिन कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए भारत सरकार की ओर से श्री प्रणब मुखर्जी                    ने उन लोगों के नाम सार्वजनिक करने से मना कर दिया। ग्लोबल फिनेंशियल इंटीग्रिटी संस्था के अनुसार केवल सन् 2000 से 2008 तक चार करोड़ आठ लाख रुपये (4.8 लाख करोड़ ) देश से बाहर भेजे गये। इससे पहले न जाने और भी कितना कुछ गया होगा उसकी सटीक जानकारी नहीं है। लेकिन सरकार का कहना है कि डबल टैक्सेशन समझौता या एक्सचेंज ऑफ टैक्सेशन इन्फोर्मेशन एग्रीमेंट के रास्ते या इनकम टैक्स विभाग यदि टैक्स चोरों के खिलाफ केस दर्ज करें तो इस मुद्दे को आगे बड़ाया जा सकता है। क्योकि आयकर अधिकारियों के पास कानूनी ताकत है, जिसके तहत वे कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं। इस संम्बंध में देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी केंन्द्र सरकार को झिड़की लगाई और कहा काले धन को केन्द्र टैक्स मे क्यों उलझा रही है। खैर भविष्य में जो भी हो काले धन को देश में वापस लाने के लिए, दृढ़ इच्छा शक्ति से आज तक किसी भी सरकार द्वारा उपयुक्त कार्यवाही या सार्थक प्रायास किया ही नही गया। काले धन रखने वालों के नामो की जानकारी करने से लेकर न जाने और क्या-क्या पापड़ बेलते देखे गए इसके लिए देश के मंत्री से लेकर उच्च पदस्थ अधिकरीयों के स्विट्जरलैंड दौरों पर देश के जनता के गाड़ी कमाई का सफेद धन, अनेकों बार काले धन को देश में वापस लाने पर खर्च किया गया, और यह सफेद धन भी काले धन में तबदील हो गया। काला तो काला कले रंग में चाहे कोई भी रंग मिला दीजिए बह रंग काला हो जायेगा। खैर यह जरुर है कि यदि कोइ भी सरकार दृढ निंश्चय कर ले कि स्विसबैंक में पड़ा काला धन देश में वापस लाना है तो इस काम को सही दिशा देने के लिए अन्य तरीकों पर भी गौर करना चाहिए था। लेकिन किसे पड़ी है कि इतना जिद्दो-जहद करें उससे उन्हे क्या मिलेगा। ऊपर से ऐसे लोगों से पगां, शत्रुता मोल क्यों लिया जाये। यह  मुद्दा हमारे देश मे अभी तक जिंदा है, यह अपने आपमें एक बहुत बड़ी बात है, नहीं तो इतने साल गुजर जाने के बाद लोगों द्वारा इसको भुला दिया जाता। हमारे हिन्दुस्तान के नेता, मंत्री और नौकरशाह जो लोग शायद कभी नहीं सुधर पाएंगे जब तक कि वे खुद नहीं सुधरना चाहेंगे, या जब तक कि उनका कोई बहुत बड़ा अनिष्ट या घटना न घटित हो जाए। भारतीय सहिष्णुता के लिए जाने जाते हैं। सहिष्णुता का यह मतलब कतई नहीं होता है कि आपका घर लुट रहा हो और आप तमाशाई बने  देखते रहें, उसे तनिक भर भी रोकने का साहस न जुटा पायें या रोकने की जरुरत महसूस न करें। वह भी जब कोइ विदेशी नही वल्कि अपने ही देश का हो यह तो सरासर दब्बू और कायरता की पहचान है। ऐसे में हमारे देश के लोगों द्वारा चुने जाने वाला सरकार या नेताओं से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं ? अक्सर यह देखा गया है कि दब्बू या कायर लोग जब कोई भी काम करते हैं तो उसे छुपाते हैं किसी को पता न लग जाये इस बात का भरसक प्रयास करते रहते हैं, उन्हे इस बात का हमेशा डर लगा रहता है क्योंकि दुसरों के द्वारा या सामाजिक विरोध-प्रतिक्रिया और उठने वाली बातों को वे सहन नहीं कर पाते हैं। या उसका सामना करना नही चाहते हैं। जिससे उनका सामाजिक दुर्दशा एवं स्तर पर फर्क पड़ता है, घर-परिवार की या निजी बातें तो एक अलग मुद्दा है, यही आदतें उन्हे चोरी करने को प्रेरित करती रहती है, और हमेशा डरे-सहमे से रहते हैं। हमारे समाज में ऐसे लोग की एक बड़ी संख्या हैं, जिनके पास यह आंकलन करने की क्षमता नहीं होती है, कि कौन सी बात कब कहाँ और किससे कहना है या नहीं। अभी-अभी हमने सुभाष जयन्ती और छब्बीस जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया। प्रत्येक छब्बीस जनवरी और पंन्द्रह अगस्त के दिन हमरे देशवासीयों का मष्तक अपने आप गर्व से उच्चाँ हो जाता है, आजादी की शुरुआती दौर से कुछ वर्षों तक सम्पूर्ण राष्ट्र का जन समुदाय जोश एवं एक नयी उर्जा से ओतप्रोत दिखाई पड़ता था। सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था कि हमारे देशवासी  तीन सौ बर्षो तक अंग्रेजों के गुलामियत के जंजीरों से जकड़े रहे हैं अतः हमें एकाएक मिली इस आजादी की इतनी बड़ी खुशी को पा कर हमारा दिमाग एकदम स्वतंन्त्र होकर अपनी सुध–बुध ही खो बैठें और इसका फायदा कोइ अन्य रुप से उठा लें इसलिए हमारी स्वतंत्रा को अछुण रखने के लिए देशवासियों को धीरे-धीरे आजादी का अहसास होने दिया जाये। परन्तु हुआ वही जो शायद नहीं होना चाहिए था। देशवासियों को अचानक आजादी की खबर सुना दी गई और देश की जनता उन्मादी खुशीयों मे तल्लिन हो गई, घर-घर घी के दीपक जलाये जाने लगे। मुट्ठी भर लोगों ने देश के साशन अपने हाथ में लेकर सत्ता पर काबिज होने की तैयारी कर ली। उस समय साशन अपने हाथ में लेने वाले लोगों में से जो उन्ही का विरोध करते उन्हे देश के संविधान लिखने में खुछ एक को अन्य प्रशासनिक कामों में लगा कर जनता से उन्हे दूर रक्खा गया। उस वक्त देशवासी इतनी बड़ी खुशी के आगे किसी भी अन्य नेता या लोगों की बात को तबज्जो नही दे पाये इसी बजह से किसी का ध्यान कौन क्या कर रहा है, इस ओर गया ही नहीं इस तरह बचे खुचे उनके विरोधी भी अलग-थलग पड़ गये। और सही समय देख कर वही लोग सत्ता पर काबिज हो गये। जो बिज हमारे जन-मानष द्वारा आज बोया जायेगा बह कल उन्हे या उनके पूर्वजों को कटना ही पड़ेगा और बही फसल हम वर्तमान में काट रहे हैँ। सत्य बहुत कड़ुवा होता है और कड़वी चीज किसी को भी पसंन्द नहीं है। दवाई कड़वी जरुर होती है, लेकिन दवाई ही फायदा पहुँचाती है।       

Tuesday, January 11, 2011

आरक्षण से क्षमा


आरक्षण  से  क्षमा
दिनांक – 11/01/2011
     *       भारत और  पाकिस्तान  के मध्य बंटवारे पर जब-जब सेमिनार हुए तब-तब यह देखा गया कि उस पर पानी फेरने के लिए मुस्लिम प्रवक्ताओं को बार- बार यह कहते हुए सुना गया है कि यह सब कुछ तो प्रतिष्ठित  मुसलमानों की कारस्तानी थी, साधारण मुस्लिम जनता का इससे कोई लेना देना नहीं था  इसे मानना पड़ता है और हम मान भी लेते हैं  चलिए  उसे छोड़ देते हैं, लेकिन यदि सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की  मांग करने वालों की हैसियत को देखा जाए, तो फिर वही मंज़र याद आ जाता है कि सब के सब कुलीन वर्ग के ही लोग हैं। कम से कम  ये वे लोग तो नहीं हैं जिन्हें लाभ मिलना चाहिए। ऐसी दशा में फिर से कोई ऐसी गलती फिर से दुहरायी न जाये कि उनकी रपटों को लागू करके एक और बंटवारे का मार्ग को खोल दिया जाय। देश व राष्ट्रीय एकता को अक्षुण   रखने की गरज से उन्हें कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए  एक बात ध्यान देने योग्य है कि इससे केवल  प्रतिष्ठित मुसलमानों की राजनीतिक कुचेष्टाओं को ही क्षति पंहुचेगी और कथित लाभार्थी व साधारण मुस्लिम जनता को इससे कोई भी फर्क नही पड़ेगा 
   इसका पहला कारण तो यह कि मुस्लिम  कुलीन वर्ग उन लाभों को साधारण मुस्लिम जनता  तक पहुँचने ही नही देंगे। जैसा कि हिन्दू दलितों के आरक्षण के साथ हुआ। इसलिए कि आरक्षण की मांग उनकी है ही नहीं। और न ही इसके लिए उन्होंने  कोई संघर्ष कियाया करने की ज़रुरत भी नहीं थी, क्योंकि वे गरीब भले रहे हों पर दमन के शिकार नहीं थे उन्हें अपनी धार्मिक व्यवस्था से कोई शिकायत  नहीं  है, और उससे उन्हें कोई परेशानी नहीं है फिर वे दलित कैसे कहे जाएँ और क्यों। यहीं पर यह  ध्यान देने की जरूरत है कि हिन्दू दलितों को आरक्षण उनके आर्थिक उत्थान के लिए नहीं, बल्कि उनके सामाजिक  सम्मान और उत्थान के  लिए है , दरअसल इसी सम्मान व उत्थान के लिए ही लडाई  है। ऐसा वे स्वयं समझते और कहते हैं। यदि ऐसा नहीं है तो आर्थिक दशा अच्छी हो जाने के बाद भी बड़े बड़े दलित अधिकारी वर्ग आरक्षण मुद्दा छोड़ चुके होते।
   सामाजिक प्रतिष्टा  को हासिल करने  के लिए क्या क्या  करना पड़ा, इसकी शुरूआत यदि अंबेडकर युग  से करें तो उन्होंने इसके लिए क्या-क्या  पापड़ नहीं बेले, क्या क्या नहीं किया। हिन्दू धर्म  की व्याख्या  करते हुए उसकी  बखिया तक उधेड़ डालीं, उसका तार तार, रेशा रेशा छिन्न भिन्न करके तहस-नहस कर दिया कथित पवित्र  किताबों वेद-पुराणों की अवमानना की  मनुस्मृति   जलाई, देवी  देवताओं को गालियाँ  दीं, संतों- महात्माओं पर कीचड़  उछाले, ब्राह्मणवाद की ऐसी -तैसी की, गाँधी जी से भी पंगा लिया, वाइसराय से भी जिद किया, कुछ करना बाक़ी नहीं छोड़ा यहाँ तक कि स्वयं धर्म परिवर्तन कर बौद्ध  भी बन गये । इतना सब कुछ करने के बाद, अभी  थोड़ा सा ही  हासिल कर  सके  हैं। आज भी जब तब उत्पीड़न के शिकार होते ही रहते हैं, और उनका  यह संघर्ष अभी भी जारी है।
      इसके ठीक विपरीत मुसलमान भाइयों  ने क्या किया। मुसलिम वर्ग इस्लाम  से चिपके रहे, उसके वफादार बने रहे, उसका गुणगान करते रहे, रोजे नमाज़ के पाबंद रहे ,मजारों पर चादरें चढ़ाते रहे। कोई परेशानी नहीं है ? इस्लाम  तो एक पूरी सामाजिक व्यवस्था है, इसमे गरीबों और मजलूमों का भी  इंतजाम है। दान और ज़कात की व्यवस्था है, यह इसीलिये की गयी, जिससे गरीबों, मजलूमों का भरण-पोषण हो सके और वे इस धर्म को छोड़ कर किसी अन्य धर्म को अपनाने न लगें  इस कथन में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि इनकी इसी  व्यवस्थाओं के कारण आज तक कोई  भी एक ऐसा उदहारण नहीं है कि इस्लाम या ईसाई अपने धर्म से निकलकर किसी  दूसरे धर्म को अपनाया । यह तो  केवल एकमात्र  हिन्दू धर्म ही है, जिससे  बहुत सारे लोग निकल कर इस्लाम या  ईसाई धर्म को अपना लेते हैं और समता, बराबरी,  भाईचारा, मानवाधिकार, स्त्री अधिकार और न जाने क्या-क्या स्वर्ग का सब्जबाग देख इससे निकलकर इन मजहबों की गोदें भरते रहे। ज़ाहिर सी बात  है कि उन्हें हिन्दू धर्म में परेशानी थीयह भी सच है कि उन मजहबों के गुण अब भी उसी प्रकार गाये जाते हैं कहीं कोई  क्षोभ, पश्चाताप या पुनरीक्षण नहीं। वे अब भी वैसे ही समतावादी, मानवतावादी होने के लिए ख्याति प्राप्त करने की होड़ में लगें  हैं। इसे  सबसे उचित और श्रेष्ठ सिद्ध करने में लादेन की अलक़ायदा से लेकर डाक्टर  जाकिर नाइक व एक छोटे से छोटे गाँव का गरीब से गरीब  मोलवी-मौलाना  तक लगा हुआ  है। उधर सुदूर जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियां भी यही काम कर रही हैं। इनकी वकालत में  भारत के महान  बुद्धिजीवी वर्ग  भी यही कहते हैं कि अताताई हिन्दू धर्म से ये निकल कर  न जायं तो क्या करें ! ज़ाहिर है कि वहाँ  उनको एक  भविष्य दिखाई देता है।
  इस बात से यह बात प्रमाणित हो जाता है और जहाँ तक हमें जानकारी है कि इन मजहबों के इन्ही सदगुणों के कारण किसी भी  ईसाई या मुसलिम मुल्कों में आरक्षण की  कोई मांग या कोई  व्यवस्था सुनाई नहीं देती है सब उनकी सुराज के कारण है,  जो हिन्दू धर्म में नहीं हैऔर यह हिन्दू  धर्म केवल हिंदुस्तान में ही है।
      ऐसी दशा  में प्यारे  गरीब  ईसाई - मुस्लिम भाइयों से यह पूछना है  कि वे हिन्दू धर्म की जेहालत - जलालत में क्यों लौटना चाहते हैं ? आरक्षण व्यवस्था उनके अपने दलितों के लिए की  गयी व्यवस्था है। वह भी उनकी गरीबे दूर करने के लिए नहीं, वल्कि उन्हें सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए है। गरीबी और गरीबों के लिए तो बी  पी एल कार्ड  है। यदि आप में तनिक भी ईमानदारी है तो उनके हक में आप कृपया छीछा, छीजन न करें। यही न्याय की बात होगी, अन्यथा उन पर  आप से भी अन्याय  होगा वे लोंग तो  पहले से ही दबे हैं।
     निवेदन है कि इन सच्चर रंगनाथ  मिश्र लोगों   पर न जाएँ और अपनी नैतिकता की आवाज़ को सुनेंहिन्दू धर्म की तमाम बुराईयों या अच्छाईयों  में एक यह भी है कि यहाँ एक ईश्वर और एक धर्म सन्देशवाहक नहीं होता है वल्कि तमाम देवताएँ होते हैं। इसी तरह के मनुष्यदेवता ही सच्चर, रंगनाथ  मिश्र जैसे लोग ही हैं। महात्मा गाँधी ने तो अपना जान ही गँवा दिया पड़ोसी मुल्क को कुछ करोड़ रूपये भारत सरकार से दिलवाने के लिए। हिन्दू के दधीच तो आपके लिए अपना  अंग -अंग दान करने के लिए तैयार हो जायेंगेपरन्तु उसे लेना  क्या उनके लिए उचित और शोभनीय होगा?
     इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि देश  का साधारण आदमी देवता नहीं हो सकता वह एक सामाजिक प्राणी हैसेकुलरिज्म या धर्म निरपेक्षता का एक अर्थ पारलौकिकता के अलावा इहलौकिकता  भी है। अब जनता अपने महात्माओं के विपरीत धर्मों की साजिशें और उनकी राजनीतिक रणनीतियां भी बखूबी समझती है  अब भारतीय लोगों को मूर्ख बनाना इतना आसान नही रह गया हैजनता ने देख लिया कि इसी आयोग के एक सदस्य ने दलित व अन्य धार्मिक समुदायों  के लिए आरक्षण के विरुद्ध ही आख्या दे डाला और वह सर्वसम्मत भी नहीं है। हिन्दू दलितों की स्थिति में अन्तर को  यहाँ रेखांकित किया गया है। आरक्षण के समर्थक  कोई भी यह बताये कि मोहम्मद  साहेब के  कार्टून के विरोध में लाखों की संख्या में गरीब मुसलमान लखनऊ और अन्य जगहों पर निकल कर आये , क्या इतने ही संख्या में लोग  अपने गरीबी के विरोध में सामने आये  हैं ? इस्लाम में जो लोग दलितावस्था को  झेल रहे हैं क्या उनमें से कोई इसके लिए सामने आये या कुछ कर रहे हैंतसलीमा नसरीन को वीजा मुसलमानों के भय से नहीं दिया जा रहा है , और भारत में इस्लाम की ताक़त उन्हीं के गरीब मुसलमान वर्ग ही है, न की सारे अमीर लोगइसीलिये , गौर से देखें , सारे अमीर उन्हे आरक्षण दिलाने के लिए ऐंडी चोटी एक कर रहे हैं, परन्तु अब यह नहीं हो सकता है, कि जब समता का मज़ा लेना हो तो ईसाई बन जांयें , इस्लाम ग्रहण कर लें , जब आर्थिक सुविधा लेनी हो तो जय श्री राम का नारा लगायेंयदि लेंना ही है तो हिन्दू धर्म के दोज़ख और नर्क में आइये,  यहीं से गए थे तो अब क्यों पड़े हैं  उस जन्नत में ! वरना तो यदि सेकुलर देश में आप तसलीमा को वीजा नहीं देने देंगे , तो हिन्दू देश भी आपको कोई आरक्षण देने में असमर्थ है। कृपया क्षमा करें।   
                  -- जी0 के0 चक्रवर्ती (priyasmpadak@gmil.com)                     
  --- उग्रनाथ श्रीवास्तव  'नागरिक' (priyasmpadak@gmil.com)